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ثُمَّ قست قصائدي

<p style="text-align: right;"><br /> أبو زيد إسماعيل &ndash; مصر</p> <p style="text-align: right;">أعددتِ&nbsp; للمنفى مكائد&nbsp; من دمٍ<br /> &nbsp;وصلبتني فوق السطور مسمّرا<br /> //<br /> لن يتلوَ&nbsp;&nbsp; الأعذار&nbsp; قلبي غافرًا،<br /> زجّي فؤادكَ&nbsp; في الجحيم لأغفرا<br /> //<br /> مُوتي - كأهل الكهف - موتا ناقصا<br /> ولتجعلي ضوء الندامة أخضرا<br /> //<br /> أنا كافر -بالعفو- منذ ولادتي<br /> جبلاً على ظهر الهموم تحدرا<br /> //<br /> وقصائدي الحبلى&nbsp; تمخض حبرها<br /> قلقًا وما زال الضجيج مفسِرا<br /> //<br /> عقلي- كما الإسفلت -يخدش وجهه..<br /> &nbsp;العابرون وليس يرحمه&nbsp; ثرى<br /> //<br /> متعملقٌ ذئب الغموض بداخلي<br /> ومحاول في البيد&nbsp; أن يتبحرا<br /> //<br /> لن أغفر الزلات حتى تخلقي<br /> من كل أمشاج المحال مبررا<br /> //<br /> &quot;إغراؤك &quot; العفوي صار خطيئة<br /> يستدرج العنقود حتى أسكرا<br /> //<br /> ما عاد يغريني النبيذ معتقًـا<br /> ما عدت أرتاد الغياب لأحضرا<br /> //<br /> لا شيء أصبح -في الصبابة - مدهشًا<br /> متوقَّع أن تمتطيكَ&nbsp; لتعبرا<br /> //<br /> حتى &quot;براويز&quot; الحنين أزلتها<br /> ليصير جدران المحبة&quot; أزعرا&quot;<br /> //<br /> وفتات خبز&nbsp; الشوق&nbsp; صار تدوسه<br /> قدمُ الفراق مهمشًا&nbsp; ومحقرا<br /> //<br /> قستِ الهوامش والمتون ولم أعد<br /> &nbsp;ألقي على مُر&nbsp; القصيدة - سكرا<br /> //<br /> فتحملي&nbsp; طبعي العنيد لأنني<br /> لا أشتهي غير الكرامة منبرا</p> <p style="text-align: right;">&nbsp;</p>